(माँ वंदना) तर्ज- आरती रे हरी री आरती
आपूँ आप अखंड अवतार, व्यापन चराचरी संसार,
जननी जग में जय जयकार, आज्यो अंबिका ये, मावड़ी अंबिका ये॥
चारों धाम धरा के चोखट धवळ धाम दवारा ये,
पाँच तत्व रो देवळ थारो करे होय हलकारा ये,
भय रो निरभय नार पलाण, देवल नवरंग उडे निसाण, जोताँ अखंड चंदा भाण॥
आज्यो………॥1॥
कुदरत केरो हरियाळो हे घाघरो घेर घुमाळो ये,
तारामंडळ अंबर ओडण दकणी चीर रूपाळो ये,
सत को साळुड़ो सणगार, जिळमिळ मोत्याँ तपे ललाड़, देवी दानव वंस दहाड़ ।
आज्यो……….॥2॥
धन घमंड की गाजे नोपताँ, अणहद की जणकारा ये,
नरबे नाम का बाजे नंगारा, बीजळ तणी तलवाराँ ये,
दसो दिसावाँ थारे हात, काळा ओरा हे दिन रात, हाजर अगवाणी में मात ।
आज्यो……….॥3॥
अखंड धाराँ अखंड बरसे करे इन्दर बरसाळा ये,
सातों समंद संपाड़ो जेले, संख ढुळे नंद नाळा ये,
आरती तिरगुण देव सवार पूरब पछम रहे उतार पवना भंवरा की फटकार ।
आज्यो……….॥4॥
रिद्धियाँ, सिद्धियाँ, निद्धियाँ हाजर खड़ी रहे हर बारा ये,
काम, करोद, मद, लोब, मोह ये, नाचे नाचण हारा ये,
यम नियम हे छडियादार बावन "भेरव" ताबेदार माँ के चरण कमल बलिहारा ये।
आज्यो……….॥5॥